समकालीन समाज की अभिव्यक्तिः धरा अंकुराई’’
श्रीमती संगीता पाटिल
व्याख्याता पंचायत (हिन्दी), शसकीय उच्चतर माधमिक विद्यालय, सेमरिया
*Corresponding Author E-mail: sangeetapatil909@gmail.com
ABSTRACT:
प्रस्तुत उपन्यास में डाॅ. असगर वजाहत ने ‘‘धरा अंकुराई’’ में समकालीन समाज की अभिव्यक्ति को छोटी-छोटी घटनाओं के जरिए प्रस्तुत किया है। उपन्यास में वर्तमान की समीक्षा के साथ जीवन की सार्थकता और प्रासंगिकता को तलाषते हुए लिखी गई यह रचना है। समृद्ध कथानक, कथारस, चरित्रों का अन्तद्र्वन्द, संवादों का सौंदर्य और अंततः जीवन के व्यापक अनुभवों की अभिव्यक्ति इस उपन्यास की महत्वपूर्ण विषेषता है। वजाहत जी की भाषा सहज, सरल, प्रवाह पूर्ण तथा विषय वस्तु के अनुरुप है। इस उपन्यास के माध्यम से व्यक्ति जीवन का अर्थ, समकालीन समाज के यथार्थ को अपने अनुभव से प्रस्तुत करता है। साथ ही लोकतंत्र के विकास के लिए आने वाली समस्याओं को ज्ञान यात्रा के माध्यम से हल करने का नवीनतम स्वरुप विकसित किया है।
KEYWORDS: समकालीन, अभिव्यक्ति, धरा अंकुराई
प्रस्तावना
असग़र वजाहत वह चर्चित नाम है जों किसी परिचय के मोहताज नही हैं। एक रचनात्मक प्रवीण लेखक के रूप में इनको मिली लोकप्रियता लंबी अवधि तक किये गए इनके अथक श्रम की देन है। जिन-जिन विधाओं में उन्होंने रचनात्मक हस्तक्षेप किया उनमें अपनी प्रतिभा की मुहर लगायी। हमेषा से ही कुछ अलग, कुछ प्रयोगषील यथार्थ चित्रित करते है, यही वजह है कि उनकी रचनाएँ स्मृतिपटल से ओझल ही नही हो पाती, वे स्थायी रूप से हृदय में विद्यमान रहती हैं। उनकी रचनाएँ जीवन की समस्याओं, पीड़ा एवं परेषानियों की उपज हैं। वजाहत जी व्यक्ति की निजता के साथ उसकी सामाजिक भूमिका को अपनी रचनाओं की विषयवस्तु बनाते रहे हैं।
‘कैसी आगी लगाई’, ‘बरखा रचाईएवं धरा अंकुराई’ त्रयी से उनका रचना स्वभाव अधिक प्रषस्त हुआ है।
‘धरा अंकुराई’ उपन्यास त्रयी का अंतिम भाग एक विस्तृत कथानक को संपूर्ण करते हुए उसे रचनात्मक सिद्धि का स्वरुप देता है। उपन्यास की कथा दो अलग-अलग स्तर पर चलती है। एक भाग में समाज के यथार्थ चित्रण की और दूसरे भाग में उपन्यास के केन्द्रिय पात्र साजिद अली के व्यक्तिगत जीवन की।
उपन्यास का मूल भाव:-
एस.एस. अली यानी सैयद साजिद अली दिल्ली के बहुत माने हुए पुराने अखबार ‘द नेषन डेली में एसोसिएट एडिटर थे। साजिद अली बेहद आनंदित, उत्साहित थे। लेकिन इस दौरान आए कई अनुभवों ने उन्हें जिंदगी से मायूस कर दिया था उन्हें चापलूसी चाटूकारिता रास न आयी। साजिद ने कामयाब जिन्दगी जी है लेकिन महसूस करते है कि उनके भीतर एक खालीपन फैलता जा रहा है। उन्हें लगता है कि अब तक जिया सब बेमकसद रहा। वें ‘जिन्दगी का अर्थ‘ समझने के लिए उसी छोटी सी जगह लौटते हैं, जहाँ से निकलकर वे जाने कहाँ कहाँ गए थे। उनका लौट कर आना वहाँ मौजूद हस्तियों को हास्यास्पद, व्यंग्यात्मक लगता है और वे उसे अनगिनत सवालों के चक्रव्यूह में खड़ा कर देते हैं - ‘‘तुम अपने को असफल कैसे मानते हो ? तुम एसोसिएट एडिटर थे। तुम्हारी सफदरजंग एन्क्लेव में कोठी है जिसकी कीमत आज कई करोड़ होगी। तुम्हारे पास दो गाड़ियाँ है - नौकर है - तुम्हारे पास लंदन में बडी जायदाद है - मतलब तुम्हारी पत्नी के पास - वह भी तुम्हारी है - तुम्हारा लड़का आक्सफोर्ड में और - तुम अपने का असफल मान रहे हो - यहाँ इस उजड़े गन्दे और चीथड़े जैसे शहर में तुम्हारी कोठी है जिसे मल्लु मंजिल कहा जाता है - केसरियापुर में अच्छी खासी जमीन है - वहाँ चैरा है - तुम असफल - ? (1) इन सवालों से साजिद के मन में उदासी छा जाती है। सवाल उसे परेषान करते हैं, वह समझाने की कोषिष करते हैं - ‘‘से सब मेरी सफलता नहीं है जिन्हें तुम गिनवा रहे हो‘‘ (2)
इन परिस्थितियों से व्याकुल साजिद गहन चिंतन में खोये रहते हैं खुद से बाते करते हैं - ‘‘क्या मैं यहाँ गुजरे हुए जमाने की तलाष में आया हैं? हरगिज नहीं क्योंकि मैं जानता हूँ अतीत कल्पना में ही जीवित रहता है उसे खोजना बेकार है और दूसरी यह कि अतीत हर पीढ़ी के लिए मुल्यवान होता है, वर्तमान से हर पीढ़ी असन्तुष्ट रहती है और भविष्य को लेकर अपार शंकाएँ होती हैं। मैं इस घिसे-पिटे चक्कर में पडने नही आया हूँ। तो फिर यहाँ आने का मकसद ? ये बड़ा सवाल है। बड़े सवालो को जल्दी हल नहीं करना चाहिए। छोटे-छोटे सवालों और उनके जवाबों से ही बड़े सवाल और उनके हल निकलते हैं ’’(3)
समकालीन यथार्थ चित्रण - समस्या सवाल के रुप में:-
हिन्दुस्तान का नाम कुडिस्तान होने की संभावना:-
साजिद के माध्यम से लेखक ने समाज का यथार्थ चित्रण छोटे छोटे सवालों के रूप में उजागर किया है। शहर में खेतो को काॅलोनी बना देने से हजारों मकानो का जाल चारों तरफ फैल गया है। काॅलोनी बनाने वाले ने करोड़ो बनाए है लेकिन इन काॅलोनियों में बनती गन्दी गलियाँ, नालियाँ भी हैं, कूड़े के ढेर है और उसपर ढेरों मच्छर पनपते है इसपर लेखक का चिंतन मात्र इसी शहर के लिए ही नहीं वह तो पूरे देष लिए है- ‘‘कूड़ा कूड़ा और कूड़ा। यह हमारे प्यारे शहर तक सीमित नहीं है। दिल्ली से कलकत्ता और केरल तक रेल की पटरियाँ के दोनों तरफ कूड़े के पहाड़ खड़े कर दिए हैं। लगता है पूरा देष भी इस कूड़े को साफ नहीं कर सकता। कुछ सालों बाद हिन्दुस्तान को कूडिस्तान कहा जाने लगेगा। यहाँ ऐसी बीमारियाँ फैलेंगी जिनका नाम भी लोगों ने न सुना होगा और इन बीमारियों का कोई इलाज न होगा।’’ (4)
बिजली का उपभोग:-
छोटे शहरों में गांवो में ग्रीष्मकाल में ऐसा महसूस होता है मानों यहां सूरज जमीन से कुछ ज्यादा ही करीब है। जितनी सीधी तीखी और तेज किरणें यहां पड़ती है इतनी दिल्ली में भी नहीं पड़ती। सच तो यह है कि शहरों में ए.सी., कूलर, पंखा जैसे साधन उपलब्ध होने के कारण आदमी घर से बाहर तक नहीं निकलता। किन्तु एयरकंडीषनिंग में कितनी बिजली लगती होगी ? इतनी बिजली का निर्माण करने के लिए कोयला, पेट्रोल कितना लगता होगा इसके आंकड़े नहीं है लेकिन - ‘‘ये आंकड़े जरुर है कि गर्मियों के दिनों में गावों, कस्बों, छोटे शहरों से आठ आठ घंटे बिजली गायब रहती है।’’ (5) इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता क्यों ?
माफियाकरण:-
शहर में नेताओं का वर्चस्व है, बड़े शासकीय कर्मचारियों रोब दाब और अलग-अलग तरह के माफिया सरगुनाओं की तूती बोलती है - ’’पिछले चार दषक में माफिया शब्द हमारी भाषा में जितना प्रचलित हुआ है उतना कोई और शब्द शायद नहीं हुआ है। माफिया के बाद घोटाला शब्द आता है और उसके भ्रष्टाचार-- माफिया के अर्थ व्यापक हो गए और उसकी अकल्पनीय श्रेणियाँ --भू माफिया, के साथ षिक्षा माफिया मेडिकल माफिया --जंगल माफिया--ट्रांसपोर्ट माफिया, न्याय माफिया, ठेकेदरार माटेंग मछली माफिया जैसे तमाम माफिया सक्रिय हैं यानी सबकुछ अपराधीकरण हो गया है।’’(6)
मिड डे मिल:-
माफियाकरण केवल छोटे कस्बों या शहरों की विषेषताएँ नहीं बल्कि देष में जो कुछ है उसके दर्षन यहाँ होते है। कुछ भी व्यवस्थित नहीं है, सब टूटा हुआ, बिगड़ा हुआ है। किसी को कोई फर्क नहीं पडता है। केन्द्रीय सरकार की योजनाएँ आँगनबाड़ी और मिड-डे-मील की वास्तविकता कुछ इस तरह से नजर आती है- ’’आंगनबाड़ी बच्चों के वेल्फेयर का प्रोग्राम है न ? -- ’’सर ऐसा बढ़िया प्रोग्राम है कागज पर कि आप देख ले तो दंग हो जाए -- पर कागज पर ही दंग होंगे --- व्यवहार में देखेंगे तो शर्म आएगी -- हाँ अब हमारे देष में दंग और शर्म के एक ही अर्थ है -- ताला। आँगनबाड़ी के दरवाजे पर ताला बन्द था -- सोचता हूँ हमारी राष्ट्रीय चिन्ह बन्द ताला होना चाहिए शेर की तीन मूर्तियों की जगह एक बन्द ताला होना चाहिए। यह देष की अस्मिता को अच्छी तरह प्रदर्षित करेगा। --पूरे शासन का जोर ‘मिड-डे-मिल’ पर रहता है - और उसी के नाम पर सब घपले होते हैं ऊपर से नीचे तक बन्दरबाँट होती है।’’ (7)
सत्ता का वर्चस्व:-
असल में छोटे शहरों में कहे या हमारे देष में सभी क्षेत्र में जिसकी सत्ता होती है वह हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व मानता है- ‘‘उनके क्षेत्रों में जो कुछ भी होगा वही करेंगे, वही जाँचे और परखेंगे। किसी बाहरी व्यक्ति को कोई इजाजत नहीं है कि दखल दे - ये लोग नए युग के जमींदार है। इनके हाथ में संविधान की ताकत है, ये लोकतंत्र के नुमाइन्दे हैं। भारत सरकार इनके माध्यम से गाँवो तक पहुँचती है। विकास की सारी योजनाओं के सूत्र इनके हाथों में है। यही आँगनबाड़ी चलाते हैं, यही मनरेगा संचालित करते हैं, यही स्वास्थ्य केन्द्रों की निगरानी करते हैं, यहीं ग्रामीण बैंको के संचालक हैं और यही एम.एल.ए. या एम.पी. के दाहिना हाथ माने जाते हैं। प्रषासन इनके प्रभाव में है वह जानता है कि इनके बिना कुछ नहीं हो सकता --यही लोग पुलिस और जनता के बीच ‘संवाद’ का माध्यम बनते हैं। संवैधानिक ताकत के अलावा इनके पास ‘बाहुबल’ भी है। अपनी जाति, बिरादरी या अपने गुंडो के माध्यम से अपने हित साधते हैं। इनके पास पैसा हैं क्योंकि विकास के नाम पर करोड़ों खपत की बन्दरबाँट में ये पहली कड़ी माने जाते हैं। इन लोगों को ‘बाईपास करके आप कहाँ जाएँगे? फिर-फिर दिल्ली रूपी शर्मगाह के दरवाजे तो तुम्हारे लिए खुले है।’’(8)
रोजगार की कमी:-
गाँवो में असुविधाओं और, रोजगार न मिलने कारण उत्पन्न असुरक्षा के वातावरण ने गाँवों के लोगो को शहर का रास्ता दिखाया परिणामतः गाँव से शहर की तरफ पलायन तेजी से हुआ है। लेखक कहते हैं - ‘‘जनता का पैसा किसी का नहीं है। यह माल मुफ्त है जो हमारे देष में बेदर्दी से बहाया जाता है और इसकी बारिष में अफसर नेता और ठेकेदार नहाते हैं। हमने लोकतंत्र के साथ-साथ ‘विकास‘ का भी एक विरला रुप विकसित किया है जो कम ही देषों में देखने को मिलेगा।‘‘ (9)
वर्तमान षिक्षा व्यवस्था:-
वर्तमान की षिक्षा व्यवस्था में हिन्दी मीडियम सरकारी स्कूलों की जगह इंग्लिष मीडियम पब्लिक स्कूलों की बाढ़ आ गई है। हिन्दी की जगह अंग्रेजी ने ले ली क्यों ? इसके पीछे सरकारी नीतियों का खोखलापन है। लेखक का मंतव्य कुछ इस तरह से है - ‘‘तो सवाल ये है कि हिन्दी पढ़कर क्या होगा ? बड़े जोर शोर से यह बात की जाती थी कि जल्दी ही हिन्दी को ज्ञान विज्ञान की भाषा बना दिया जाएगा लेकिन हुआ क्या ? आज हिन्दी न तो ज्ञान की भाषा है और विज्ञान की भाषा है। यही नहीं हिन्दी की सामाजिक प्रतिष्ठा क्या है ? अंगे्रजी आज भी शासक वर्ग और उच्च वर्ग की भाषा है। अंग्रेजी ज्ञान का कारक है और ज्ञान का छेद है। फिर कोई हिन्दी क्यों पढ़े ? हिन्दी जानने वाले को वह सम्मान क्यों मिले जो अंग्रेजी वालों को मिलता है। यहीं नहीं हिन्दी पिछड़ रही है। आज हिन्दी की वह स्थिति नहीं है जो चालीस साल पहले थी। बड़े शहरों की देखा देखी आज छोटे शहरों और कस्बों में अंग्रेजी माध्यम पब्लिक स्कूल क्यों अपना एकाधिकार जमा चुके हैं ? आज हिन्दी माध्यम स्कूलों में गरीब से गरीब आदमी अपने बच्चों को नहीं पढ़वाना चाहता।’’ (10)
न्याय मंदिर का अनोखा हाल:-
षिक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंतनीय तो है ही, साथ ही ‘न्याय के मंदिर का हाल भी अनोखा है सच को झूठ और झूठ को सच दर्षाने वाला यह पेषा भी सामाजिक समस्याओं का पिटारा है। असग़र वजाहत लिखते हैं - ‘‘षहर में जितनी तादाद वकीलों की है उतनी किसी पेषे से ताल्लुक रखने वाले लोगों की नहीं है-- हमारे देष के इतिहास में उनका अभूतपूर्व योगदान है। देष को बनानेवाले भी वही है और देष को तोड़नेवाले भी वहीं थे - पता नहीं क्यों, कब, कहाँ किस तरह वकीलों के लिए काला रंग सुनिष्चित कर दिया गया था। कम से कम हमारे देष में तो काला रंग अच्छा नही माना जाता है लेकिन वकीलों के कोट काले रंग के होते है, बक्से काले रंग के होते है। इस तरह न्याय के मन्दिर में सब काला ही काला दिखाई देता है।’’ (11)
साजिद के व्यक्तिगत जिंदगी की कषमकष:-
समाज का जायजा लेते लेते साजिद के माध्यम से लेखक समाज की तमाम समस्याओं का चित्रण करते हैं, समाज के प्रति उत्तरदायित्व को निभाते निभाते, सत्य की परतें खोलते हैं। इस दौरान साजिद की व्यक्तिगत जिन्दगी की कषमकष भी चलती रहती है। सफल जिंदगी में उदासी, खालीपन के बादल भी छाये हुये है- छोटे शहर लौटकर अपनी पुष्तैनी घर मल्लु मंजिल में अपने अनुसार परिवर्तन करते है। साजिद की पत्नी नूर और बेटा हीरा लंदन में रहते हैं। बहरहाल साजिद के साथ अनुराधा रहती है, परंतु दोनों के रिष्ते को समाज मान्यता नहीं देता हैं।
इसी दौरान उसकी मुलाकात नाजो से होती है वास्तव में नाजो सल्लो की नातिन है, वही सल्लो जिसके साथ युवावस्था में साजिद का प्रेम संबंध रहा है। सल्लो साजिद के घर खाना पकाने वाली बुआ की बेटी थी। साजिद और सल्लो की शादी नहीं हो पाती क्योंकि साजिद अपने खानदान की प्रतिष्ठा को धूल में नहीं मिलाना चाहता था। और उसमें इतनी हिम्मत न थी कि घरवालों से इस संबंध में कुछ कहे। परिणामतः सल्लो की शादी रिक्षाचालक से हो जाती है।
साजिद नाजो को पढ़ाते लिखाते हैं, इस दौरान नाजो में सल्लो को हर वक्त ढूंढते हैं क्योंकि नाजो हूबहू सल्लो की तरह दिखती है। नाजो और अपने उम्र के अंतराल को कुछ पल के लिए नजरअंदाज करना चाहते हैं वह नाजो के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। इसी बीच कहानी नये मोड़पर आती है, साजिद का बेटा हीरा लंदन से लौटता है। और पहले जी नजर में नाजो का पसंद करता है, उससे शादी करने का फैसला लेता है। हीरा की यह पहल समाज के लिए आदर्ष प्रस्तुत करती है। सच तो यह है कि मूलतः पत्रकार होने के नाते साजिद के माध्यम से असगर वजाहत ने हमें जो यथार्थ दिखाया है, समस्याओं की रणभूमि को चित्रांकित किया है, उस रणभूमि में वे हमें मझधार में नही छोड़ते बल्कि एक सफल योद्धा के रूप में उन समस्याओं का हल भी कलम जैसे शस्त्र के माध्यम से करते हैं।
समस्याओं का हल - ज्ञान यात्रा के माध्यम से:-
साजिद स्वच्छता अभियान के अंतर्गत कूड़ा उठाने का सोचते है। अपने सभी साथियांेद्वारा सहायता लेते है यह छोटी सी बात राजधानी तक चली जाती है - बात दरोगा जी तक पहुँचती है लेकिन नतीजा यह निकलता है कि नगरपालिका से ट्रैक्टर आएँगे और कूड़ा हटाया जायेगा, उन्होने समस्या को उजागर भी किया और सहजता से युक्तियों द्वारा हल करने की कोषिष भी की है। उनकी राय यह भी कि धर्मस्थल का निर्माण ऐसी जगहों पर हो जहाँ विवाद की स्थिति ना बने। साजिद धीरे धीरे पूरे शहर का जीर्णोद्धार करने एक यात्रा की योजना बनाता है इसका उद्देष्य यह था कि गाँव की, छोटे शहरों की, इलाके की स्थिति, समस्यांओं, चुनौतियों, संस्कृति, षिक्षा विभाग, स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति, को जानना और समझना। जागरूकता रैली के साथ छोटी छोटी फिल्में दिखायी जायेंगी, खेलकूद का प्रबन्ध, प्राचीन स्मारको का अवलोकन भी किया जायेगा।
इस यात्रा की क्रियान्वयन हेतु सभी छात्र, शहर के लोगों के साथ बातचीत हुई और कई पक्ष सामने आए। अधिकतर की राय थी कि - ‘‘यह सांस्कृतिक होना चाहिए। लेकिन उसके साथ साथ इसकी व्यवहारिक उपयोगिता भी जरुरत है। युवा लोगों को केन्द्र में रखकर कुछ सिखाने या जानकारियां देने के कार्यक्रम भी ज्ञानयात्रा का हिस्सा होना चाहिए। कम्प्यूटर की जानकारी - यात्रा के दौरान एक डाॅक्टर और एक वकील का होना जरुरी - सामान्य बीमारियों तथा उसके उचित और सस्ते उपचार से संबंधित कुछ फिल्में और पुस्तिकाएँ ..... यात्रा नवम्बर के महीने से प्रारंभ की जायें .............. साथ जाएगा एक प्रोजेक्टर, एक कम्प्यूटर, सी.डी. पर फिल्में, आवष्यक किताबें, स्वास्थ्य और कानून सम्बन्धी आवष्यक पोस्टर और पैम्पलेट ............ इस सामग्री को तैयार करना एक बहुत मुष्किल काम लगा इसलिए तय किया कि जिन जिन संस्थाओं ने ऐसी सामग्री बना रखी है उनसे ले ली जाए. और भी अन्य बातों को तय किया गया। (12)
उपन्यास निहितार्थ:-
अंततः साजिद सोचता है वह जीवन की परिभाषा से अवगत हो गया है यही उसकी अन्तः यात्रा है। धीरे धीरे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े बहुत से लोग जिंदगी के अर्थ को समझने के लिए ज्ञानयात्रा में शामिल होने चले जाते है। यह यात्रा जीवन का अभिप्राय खोजने की यात्रा है और एक महत्पूर्ण प्रसंग में आये इस वाक्य में कहीं इस उपन्यास का निहितार्थ व्याप्त है. ‘‘यह यात्रा संसार के हर आदमी को जीवन में एक बार तो करनी ही चाहिए।’’(13)
अतः कहा जा सकता है कि असग़र वजाहत की उपन्यास त्रयी का यह अंतिम भाग ‘धरा अंकुराई’ व्यक्ति और समाज की कषमकष के महाकाव्य के रूप में सामने आया है। यह उपन्यास व्यवस्था के घटाटोप अंधेरे में उम्मीद की एक किरण दिखाता है, बषर्ते सैयद साजिद अली जैसा अन्तयात्रा का संकल्प हो क्योंकि इस अन्तःयात्रा से व्यवस्था में बदलाव संभव है। वास्तव में असगर वजाहत का यह उपन्यास ज्ञानयात्रा है - अनेक विवरणों, वृतान्तों के माध्यम से देष को जानने और समझने की। उनकी रचनाओं में जीवन का यर्थाथ रूप अपने अपने परिवेष के साथ दीप्तिमान हुआ है।उनकी यही विषेषता समकालीन हिन्दी साहित्यकारों की श्रृंखला में उन्हें श्रेष्ठ स्थान देती है।:-
संदर्भ:-
1. वजाहत असगर: ‘‘धरा अंकुराई‘‘ राजकमल प्रकाषन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2014. पृ. -9
2. वही - पृ. - 9
3. वही - पृ. - 29
4. वही - पृ. - 31
5. वही - पृ. - 46
6. वही - पृ. - 50
7. वही - पृ. - 63-64
8. वही - पृ. - 74
9. वही - पृ. - 78
10. वही - पृ. - 80
11. वही - पृ. - 112
12. वही - पृ. - 168
13. वही - पृ. - 182
Received on 26.02.2019 Modified on 16.03.2019
Accepted on 21.04.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):481-485.